बच्चों का दर्द भगाने के लिए 79 वर्षीय डाॅक्टर ने फिर से शुरू की पढ़ाई

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कानपुर। दूसरों का दुख और दर्द देखकर कई लोग भावुक होते हैं। अपने सामर्थ्य के अनुसार मदद के लिए आगे आते हैं या फिर भगवान से उनके लिए दुआएं करते हैं। समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कि लोगों के कष्ट हमेशा के लिए खत्म करने को स्वयं कदम बढ़ाते हैं। हम बात कर रहे हैं 79 वर्षीय पदमश्री डाॅ.सरोज चूड़ामणि गोपाल की, जिन्होंने बच्चों में लाइलाज बीमारी पैरेप्लेजिया के स्थाई इलाज के लिए आईआईटी कानपुर में दाखिला लिया है। वह बायोलाॅजिकल साइंस एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग से प्रो. अशोक कुमार के निर्देशन में पीएचडी कर रहीं हैं। डाॅ. सरोज इसी विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर भी हैं। वह भारतीय डॉक्टर और चिकित्सा शिक्षाविद् हैं। उन्हें देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली की पहली महिला एमसीएच पीडियाट्रिक सर्जन माना जाता है। वर्तमान में नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज की अध्यक्ष हैं। मेडिकल एंड मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 2013 में पद्मश्री के सम्मान से नवाजा गया।

आगरा के मेडिकल काॅलेज से किया एमबीबीएस
पदमश्री डाॅ.सरोज चूड़ामणि गोपाल का जन्म 25 जुलाई 1944 को मथुरा में हुआ। उन्होंने 1966 में आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और 1969 में एमएस किया। वर्ष 1973 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के चिकित्सा विज्ञान संस्थान की फैकल्टी बनीं। यहां चिकित्सा अधीक्षक और डीन होकर 2008 में सेवानिवृत्त हुईं। इसके बाद लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में कुलपति का पदभार ग्रहण किया। वह केजीएमयू का नेतृत्व करने वाली पहली महिला कुलपति बनीं।

आईआईटी की दो कक्षाओं में हो रहीं शामिल
प्रो.अशोक कुमार ने बताया कि पदमश्री डाॅ.सरोज चूड़ामणि गोपाल सही मायने में पैरेप्लेजिया का इलाज खोजने के लिए आईं हैं। उनमें गजब का उत्साह है। अभी दो कक्षाओं में शामिल हो रही हैं। उनकी बायो केमिकल और प्रो. संतोष मिश्रा की टिश्यू इंजीनियरिंग की कक्षाओं में रोजाना बैठ रहीं हैं। उन्होंने पैरेप्लेजिया पर शोध शुरू कर दी है।
प्रो. अशोक कुमार के मुताबिक स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगने से पैरालिसिस होता है। बच्चों में इस बीमारी (पैराप्लेजिया) का कोई इलाज नहीं है। आईआईटी कानपुर रीजेनरेटिव मेडिसिन पर काम करता है। कुछ दिन पहले थ्रीडी प्रिंटिंग से स्पाइनल कॉर्ड इंजरी को ठीक करने पर काम हुआ है। इसमें पॉलीमरीक मैटेरियल से थ्रीडी ट्रांसप्लांट या टिश्यू इंजीनियरिंग का उपयोग करते हैं। स्टेम सेल भी इसी का एक रूप है। इस तकनीक को टारगेटेड मेडिसिन की तरह विकसित किया जाएगा, जिसमें प्रभावित हिस्से में ही सिर्फ इलाज होगा।

इंप्लांट को बनाया जाएगा और ताकतवर
आईआईटी के विशेषज्ञ और डाॅ. सरोज चूड़ामणि मिलकर स्पाइनल कॉर्ड के थ्रीडी इंप्लांट को ताकतवर बनाने पर काम करेंगी। इसको ताकतवर बनाने के लिए बोन मैरो के स्टेम सेल के फंक्शनल मॉलिक्युल्स का इस्तेमाल किया जाएगा। डॉक्टर सरोज स्वयं पीडियाट्रिक सर्जन हैं। वह क्लीनिकल टेस्टिंग या टारगेटेड मेडिसिन पर विशेष कार्य करेंगी।

डाॅ. सरोज के नाम उपलब्धियां और अवार्ड
-पद्मश्री
-डॉ. बीसी रॉय पुरस्कार
-राष्ट्रमंडल चिकित्सा छात्रवृत्ति
-आईएनएसए वरिष्ठ फेलोशिप
-इंडो जर्मन फेलोशिप
-इंडो फिनिश फेलोशिप
-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग फेलोशिप
-राष्ट्रपति पदक
-सुशीला नायर शील्ड
-डॉ. मृदुला रोहतगी ओरेशन पुरस्कार
-कर्नल संगम लाल ओरेशन पुरस्कार

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