किडनी रोग की स्टेज वन है खतरनाक

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गुर्दा रक्त से अतिरिक्त द्रव्य और बेकार के पदार्थाे को हटाने का कार्य करते हैं। जब उनमें हानिकारक तत्वों को छानने या बाहर करने की क्षमता खत्म हो जाती है, तब मरीज को डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है। इसको किडनी रोग की स्टेज वन कहते हैं। यह बात मेदांता हाॅस्पिटल गुरुग्राम के नेफ्रोलाॅजी एंड किडनी टांसप्लांट के निदेशक डाॅ.श्याम बिहारी बंसल ने कही। वह रविवार को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर से गुर्दा रोगों के संबंध में आयोजित सेमिनार में बोल रहें थे। उन्होंने बताया कि इस स्तर पर जब गुर्दा पूरी तरह से काम करना बंद कर दे तो मरीज को खून में जमा अपद्रव्यों को बाहर निकालने के लिए नियमित रूप से डायलिसिस करानी पड़ती है।                                                 कई मामलों में किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। यह प्रत्यारोपण जीवित या मृत शरीर से किडनी लेकर उस व्यक्ति में लगाई जाती है जिसकी किडनी ने ठीक तरह से कार्य नहीं कर रही होती है। डाॅ. बंसल के मुताबिक गुर्दा दान करने वाला गुर्दा देने के बाद सामान्य और आरामदायक जीवन जी सकता है। उसे अपने खाने पीने और लाइफस्टाइल बदलने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। आमतौर पर किडनी दान करने वाले की किडनी हटाने के लिए लेप्रोस्कोपी का उपयोग किया जाता है। लेप्रोस्कोपी का फायदा यह है कि इसमें दर्द कम होता है, हॉस्पिटल में कम समय के लिए रुकना पड़ता है। काफी संख्या में लोगों को मरीजों को गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए इंतजार करना पड़ता है। यह वह लोग हैं, जिन्हें किडनी दान करने वाले लोग नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में उन्हें मृतकों से मिलने वाली किडनी प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा सूची में अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करनी होती है। प्रत्यारोपण के समय नई किडनी पेट के निचले हिस्से में लगाई जाती नई किडनी की रक्तवाहिकाएं पेट के निचले भाग में पाई जाने वाली रक्त वाहिकाओं से जोड़ दी जाती हैं।                         नई किडनी की मूत्रवाहिका को मूत्राशय से जोड़ दिया जाता है। एक किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी सामान्य रूप से तीन से चार घंटे मैं होती है। शरीर को नई किडनी को अस्वीकार करने से रोकने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली दवाओं को आजीवन लिया जाना चाहिए। चेयरपर्सन के रूप में वरिष्ठ गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना भदौरिया और डॉ. देशराज गुजर मौजूद रहे, जबकि वैज्ञानिक सचिव डाॅ. मनीष निगम और वित्त सचिव डाॅ. दीपक श्रीवास्तव ने भी व्याख्यान दिए।
आईएमए कानपुर के उपाध्यक्ष डा अखिलेश शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए इस बीमारी की गम्भीरता के विषय में जानकारी दी। आईएमए एएमएस कानपुर सब चैप्टर की चेयरपर्सन डॉ. शालिनी मोहन ने बताया कि इस वर्ष ये आईएमए एएमएस की द्वितीय सीएमई है। 16 जून को भी एक और सीएमई प्रोग्राम का आयोजन किया गया है, जिसमे विभिन्न विषयों पर व्याख्यान होगे। धन्यवाद ज्ञापन आईएमए कानपुर के सचिव डॉ कुनाल सहाय ने दिया।

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